जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में एमओपी पर असहमति

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नई दिल्ली. केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू के देश के मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र से उपजे विवाद की जड़ जजों की नियुक्ति का प्रक्रिया ज्ञापन (एमओपी) है. सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में कह दिया था कि वह अंतिम है, और उसमें अब कोई बदलाव नहीं होगा. हाल ही में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने कहा था कि कोलेजियम में कोई सुधार नहीं होगा, वह बिल्कुल उचित है.

एमओपी में परिवर्तन का आदेश दो संविधान पीठों ने दो बार दिया है, एक बार 2015 में और दूसरी बार सात जजों की पीठ ने 2017 में. वर्ष 2015 में संविधान पीठ ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति कानून (एनजेएसी) कानून को रद्द करते हुए निर्देश दिया था कि सरकार और देश के मुख्य न्यायाधीश मिल कर परामर्श के साथ एमओपी में सुधार करें. इसके बाद 2017 में कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस सीएस कर्णन को अवमानना में छह माह की सजा सुनाने के साथ सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की पीठ ने कहा था कि कोलेजियम प्रणाली विफल हो गई है. इस प्रणाली में जज की ठीक से खोज और मूल्यांकन करने की क्षमता नहीं है. कर्णन जैसे जज इस प्रणाली के जरिये चुन लिए जाते हैं क्योंकि इसमें पारदर्शिता नहीं है.

इन फैसलों के बाद सरकार और सुप्रीम कोर्ट में दो साल तक एमओपी में बदलाव को लेकर वार्ता तथा परामर्श जारी रहा लेकिन दो मुद्दों पर बात नहीं बनी. पहला यह था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सरकार को कोलेजियम की सिफारिश को निरस्त करने का अधिकार होगा. दूसरा यह कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में सचिवालय स्थापित होंगे जहां कोलेजियम की सिफारिशों और परामर्श का रिकॉर्ड रखा जाएगा. इससे प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी.

इन दोनों मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट सहमत नहीं हुआ और बातचीत बेपटरी हो गई. इसके बाद कोर्ट ने 2017 के अंत में एमओपी पर परामर्श बंद कर दिया और पुराने एमओपी पर ही नियुक्तियां होनी शुरू हो गईं.

क्या है एमओपी

सेकंड जजेज केस (1993) में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने एमओपी बनाया था. इसमें जज बनने वाले व्यक्ति की योग्यता, अनुभव, उसकी कार्यशीलता, संविधान की समझ, गैर राजनैतिक होने आदि की शर्तें हैं. इसके अलावा इसमें प्रक्रिया है जिससे योग्यताएं कैसे जांची जाएंगी यह बताया गया है. इस दौरान राज्य सरकार और राज्यपाल से भी टिप्पणियां ली जाएंगी. कोलेजियम इन जांचों के बाद उम्मीदवारों की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजेगा और केंद्र सरकार उसे मंजूर करेगी. केंद्र सरकार इन सिफारिशों को एक बार लौटा सकती है लेकिन दूसरी बार भेजने पर सिफारिशों को मंजूर करना होगा.

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