नोटबंदी का निर्णय सही सुप्रीम कोर्ट

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उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने वर्ष 2016 में पांच सौ और एक हजार रुपये के नोटों को चलन से बाहर करने के केंद्र सरकार के फैसले को सोमवार को 41 के बहुमत से वैध ठहराया. पीठ ने कहा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया महज इसलिए त्रुटिपूर्ण नहीं थी कि इसकी शुरुआत सरकार ने की थी. वहीं, पीठ में शामिल एक न्यायमूर्ति ने सरकार के फैसले को लेकर सवाल उठाए.

न्यायमूर्ति एसए नजीर की अध्यक्षता वाली पांच जज की पीठ ने नोटबंदी के निर्णय के कानूनी या संवैधानिक रूप से त्रुटिपूर्ण नहीं होने का जिक्र करते हुए कहा कि कार्यपालिका की आर्थिक नीति से जुड़ा फैसला होने के चलते इसे पलटा नहीं जा सकता. पीठ में न्यायमूर्ति बीआर गवई, बीवी नागरत्ना, एएस बोपन्ना और वी रामासुब्रमण्यन भी शामिल हैं.

प्रक्रिया में कमी नहीं पीठ ने कहा, आठ, नवंबर 2016 को जारी अधिसूचना को अतार्किक नहीं कहा जा सकता. निर्णय लेने की प्रक्रिया में कोई कमी नहीं थी. इस फैसले का इसके उद्देश्यों से तार्किक संबंध था. जैसे कि काला धन, आतंकवाद का वित्तपोषण आदि का उन्मूलन करना आदि. शीर्ष न्यायालय ने कहा, चलन से बाहर किए नोटों को बदलने के लिए 52 दिनों का समय दिया गया था. इसे अब नहीं बढ़ाया जा सकता.

कानून बनाकर लेना था फैसला न्यायमूर्ति नागरत्ना ने अल्पमत के फैसले में भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 26 (2) के तहत केंद्र की शक्तियों के संबंध में बहुमत के फैसले से असहमति जताई. उन्होंने कहा कि पांच सौ और एक हजार रुपये के नोट कानून बनाकर ही रद्द किए जा सकते थे, न कि एक अधिसूचना के जरिए. देश के लिए इतने महत्वपूर्ण विषय से संसद को अलग नहीं रखा जा सकता.

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