इसरो शनिवार को रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल की जमीन पर लैंडिंग का परीक्षण करेगा. इसके बाद इसे सभी चरणों के लिए तैयार माना जाएगा. इसरो की ओर से ट्वीट कर इसकी जानकारी दी गई है.
यह स्वदेशी स्पेस शटल है. लैंडिंग से पहले इसे एक छोटे रॉकेट या हेलिकॉप्टर से जमीन से करीब तीन किलोमीटर ऊपर लान्च किया जाएगा. इसके बाद यह खुद से अपना रास्ता तय करते हुए कर्नाटक के चल्लाकरे के स्थित डिफेंस रनवे पर लैंड करेगा.
रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल दो स्टेज का स्पेश शटल है. पहला रीयूजेबल पंख वाला क्राफ्ट जो ऑर्बिट में जाएगा. इसके नीचे एक रॉकेट होगा जो ऑर्बिट तक पहुंचने के बाद सैटेलाइट छोड़कर वापस आ जाएगा. इसरो का मकसद है कि साल 2030 तक इस प्रोजेक्ट को सफल बनाया जाए. ताकि बार-बार रॉकेट बनाने का खर्च बचे. इससे स्पेस मिशन की लागत कम से कम दस गुना कम हो जाएगी. ऐसे विमानों से डायरेक्टेड एनर्जी वेपन का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. ये ऊर्जा की किरण भेजकर दुश्मन के संचार तकनीक को खत्म कर देगा. इसके अलावा बिजली ग्रिड और कंप्यूटर सिस्टम को नष्ट कर देगा. रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल के अत्याधुनिक वर्जन से भारतीय अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष में भी भेजा जा सकता है. अभी ऐसे स्पेस शटल बनाने वाले देशों में अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और जापान शामिल हैं.
सात साल पहले हुई थी टेस्ट फ्लाइट सात साल पहले 2016 में इसने पहली बार उड़ान भरी थी . तब इसे एक रॉकेट के ऊपर लगाकर अंतरिक्ष में भेजा गया था. जमीन से करीब करीब 65 किलोमीटर ऊपर पहुंचने पर इसने हाइपरसोनिक गति से उड़ान भरी थी. इस दौरान इसकी रफ्तार आवाज की गति से करीब पांच गुना ज्यादा थी. उसके बाद 180 डिग्री पर घूमकर वापस आ गया था. इसे बंगाल की खाड़ी में उतारा गया था.
इस रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल की लंबाई करीब 6.5 मीटर वहीं, इसका वजन 1.75 टन है. इसके सफल परीक्षण के बाद इसे छह गुना बड़ा बनाया जाएगा.
