दिल्ली में अपराधियों की पेशी झारखंड व गुजरात जैसे राज्यों की तरह होनी चाहिए. क्योंकि वहां अदालत में वर्चुअल पेशी की व्यवस्था है. हर पेशी पर अपराधियों वहां खुद मौजूद रहने की अनिवार्यता को खत्म किया जाए.
दिल्ली सरकार के गृह विभाग ने इस व्यवस्था को दिल्ली में लागू करने के लिए सीआरपीसी 273 में बदलाव को लेकर एक प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेज दिया है. इस बदलाव के लिए खूंखार अपराधियों की सुरक्षा, राजधानी में बढ़ती गैंगवार व उस पर होने वाले खर्च समेत अन्य कारण बताए गए हैं.
तिहाड़ में बीते एक महीने में दो अपराधियों की हत्याएं हो चुकी हैं. यह गैंगवार के चलते हो रही हैं. सवाल यह है कि जेल में बंद अपराधी यह योजनाएं कैसे कब बना रहे हैं. वरिष्ठ अधिकारियों की मानें तो जब गैंग के सदस्य जो जेल में बंद हैं वह कोर्ट में पेशी के लाए ले जाते हैं, उसी समय उनके साथी अन्य सदस्य उनसे किसी न किसी तरीके से मिलकर इन घटनाओं की योजनाओं को आगे बढ़ाते हैं. इससे अपराध तो बढ़ता ही है गैंगवार में उनकी सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है. यही वजह है कि गृह विभाग ने केंद्र सरकार से दिल्ली में अपराधियों की कोर्ट में वर्चुअल पेशी का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा है.
सालाना बीस करोड़ का खर्च बचेगा
वर्तमान में गुजरात सरकार ने 2017 में सीआरपीसी 273 में यह बदलाव किया था. उसके बाद 2019 में झारखंड सरकार ने भी यह बदलाव किया था. सीआरपीसी 273 कहता है कि घटना से जुड़ा साध्य अभियुक्त की उपस्थिति में लिया जाना चाहिए. मसलन, कोर्ट में घटना की सुनवाई के दौरान जो भी साक्ष्य पेश किया जा रहा है उस समय उस आरोपी का कोर्ट में मौजूद होना जरूरी है. आधिकारिक सूत्रों की मानें तो केंद्र सरकार को जो प्रस्ताव भेजा गया है उसमें अपराधियों के कोर्ट में पेशी यानी उनके लाने ले जाने पर होने वाले सालाना खर्च 20 करोड़ रुपये का है. उसके अतिरिक्त बड़ी संख्या में पुलिस बल को इस काम में लगाया जाता है.
