हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया: रेरा कोर्ट नहीं, नियामक संस्था, शिकायत के लिए समयसीमा नहीं

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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जस्टिस बीडी गुरु ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में रेरा के अधिकार को लेकर साफ कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि रेरा न्यायालय की श्रेणी में नहीं आता, वह नियामक संस्था है। ऐसी संस्थाओं में देरी से केस दायर करने का हवाला देकर केस को खारिज करना गलत है।

केस खारिज करने के लिए समय-सीमा की पांबदी को कारण नहीं माना जा सकता। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा है कि रेरा यानी रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी एक विशेष नियामक संस्था है, जिसे कोर्ट की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

रेरा में शिकायत दर्ज कराने के लिए समयसीमा की कोई पाबंदी नहीं

हाई कोर्ट ने मकान खरीदने वालों के अधिकार को लेकर कहा है कि रेरा में शिकायत दर्ज कराने के लिए समयसीमा की कोई पाबंदी नहीं है। लिहाजा, देरी के आधार पर शिकायतों को खारिज नहीं किया जा सकता।

जगदलपुर निवासी निधि साव ने रायपुर की सीमा से लगे दुर्ग जिले के अमलेश्वर स्थित ग्रीन अर्थ सिटी में एक फ्लैट बुक कराया था। बिल्डर पर समय पर कब्जा नहीं देने और घटिया निर्माण का आरोप लगाते हुए मामले की शिकायत स्थानीय प्रशासन से की थी। जिम्मेदार अधिकारियों ने उनकी शिकायत पर कार्रवाई करने के बजाय, नजरअंदाज कर दिया। आखिरकार, परेशान होकर उन्होंने रेरा में शिकायत दर्ज कराई थी।
रेरा ने दिया था ये फैसला

रेरा ने बिल्डर को दो महीने में काम पूरा कर कब्जा देने का आदेश दिया। याचिकाकर्ता खरीदार को बकाया राशि जमा करने को कहा था। इस आदेश के खिलाफ खरीदार ने रेरा अपीलीय ट्रिब्यूनल में अपील की। मामले की सुनवाई के बाद ट्रिब्यूनल ने अपील को खारिज कर दिया। विलंब से आवेदन पेश करने का हवाला देते हुए ट्रिब्यूनल ने आवेदन को खारिज कर दिया था।
ट्रिब्यूनल के फैसले काे हाई कोर्ट में दी चुनौती

ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती देते हुए निधि से छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द कर दिया है। मामले को वापस ट्रिब्यूनल भेजते हुए निर्देश दिया है कि अब इस मामले की सुनवाई गुण-दोष के आधार पर नए सिरे से की जाए, न कि समय सीमा के तकनीकी आधार पर।

इसलिए गलत था ट्रिब्यूनल का फैसला

रेरा एक्ट की धारा 31 के तहत शिकायत करने के लिए कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं की गई है। लिमिटेशन एक्ट मुख्य रूप से सामान्य दीवानी अदालतों पर लागू होता है। रेरा जैसे विशेष निकायों पर इसे तब तक नहीं लागू किया जा सकता, जब तक कानून में स्पष्ट न लिखा हो।

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