पुरुषार्थ का आधार प्रेम हो तो आप युग निर्माता बन सकते है : डॉ मनोज कुमार अग्रवाल

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सनातन धर्म में चार पुरुषार्थ की चर्चा जोरों से होती है …धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष अतएव धर्म को जीवन की प्रथम सीढ़ी के रूप में निरूपित किया गया है।

अर्थात धर्मानुसार अर्थोपार्जन,धर्मानुसार काम का उपयोग तदुपरांत मोक्ष निश्चित है।अब प्रश्न उठता है कि वास्तव में धर्म क्या है? अब धर्म को तो हजारों वर्षों से करोड़ो महानुभावों ने परिभाषित किया लेकिन नेती नेती कहते हुए अपना हाथ खड़ा कर दिया अंत में भारत के मनीषियों ने खूब चिंतन कर उद्घोष कर दिया की धर्म का अंतिम और उत्कृष्ट अर्थ केवल और केवल प्रेम ही है।

वास्तव में प्रेम पंचम और पवित्र पुरुषार्थ है जिसके होने मात्र से जीवन की सारी दुविधा,कष्ट,शोक और दुख का नाश हो जाता है।
प्रेम ही वास्तविक प्रार्थना है प्रेम है तो दुनिया के प्रति आपकी शिकायत मिट जायेगी प्रेम है तो पूर्ण परमात्मा सदैव साथ है।मेरे अनुसार मानव समाज ने विज्ञान के क्षेत्र में खूब उन्नति की है लेकिन दुर्भाग्य है कि आध्यात्मिक क्षेत्र में हमारा उतना ही पतन हुआ है जिसका सबसे बड़ा कारण हमारा हमसे ही दूर चले जाना है।

कि वास्तव में प्रेम जीवन कि सबसे अनमोल निधि है या यूं कहे किसी भी देश काल एवं परिस्थिति का सामना करने हेतु शानदार शस्त्र और कवच दोनों है।इसका उपयोग करने वाले कभी हताश निराश और बेचैन नहीं होते, बल्कि सदैव उत्साह से भरे हुए अपने जीवन में मस्त रहते है।वास्तव में प्रेमी व्यक्ति का कर्म भी शुभ होता है यदि कोई सच्चा प्रेमी है तो समझ लें वो पुरुषार्थी होगा क्योंकि पुरुषार्थ की प्रेरणा भी प्रेम से ही मिलती है।आप धर्म परायण बनते जाते है,प्रयास करें हमारा कोई भी आचरण धर्म विरोधी न हो क्योंकि हमें मानव तन मिला है पता नहीं कल।

कौनसी योनि में हमारा जन्म होगा।इसी योनि में हम प्रेमयुग का निर्माण कर सकते है।जिसकी शुरुवात खुद से करनी होगी हमें सबसे पहले खुद से प्रेम करना सीखना होगा।अगले पिछले जन्म में नहीं वरन इसी जन्म में ही। कुछ लोगों को दूसरे जन्म कि बातें भी खोखली लगती है स्वर्ग नरक बकवास लगता है,लेकीन एक बात ध्यान देने योग्य है कि यदि स्वर्ग नरक नहीं भी है तो वर्तमान के सुख और निर्माण के लिए भी हमें अच्छे कार्य कर ही लेने चाहिए।
मृत्यु के पाश्चात्य स्वर्ग नहीं भी मिला तो आज हम आनंद में रहेंगे। कल्पना करें यदि स्वर्ग नरक जैसी बात रही और आपने अच्छे कर्म नहीं किये तो आपका क्या होगा सिवा पछतावा के कुछ नहीं रहेगा।

प्रकृति में प्रत्येक कार्य बड़े ही अनुशासित रूप से चल रही है,पशु पक्षी अपने व्यवहार में पारंगत अपने कार्य का संचालन ठीक ठाक ही कर रहे है,समस्या यह है कि मानव अपने कार्य को ठीक ठीक नहीं कर रहा इसका कारण भी यह है कि हममें समझ कि कमी हो गई है करोड़ो कि वस्तु हमारे पास है लेकिन हम कौड़ी के लिए तरसते रहते है।

ईश्वर ने हमें मानव बनाया बस यही सबसे बड़ा अहसान कर दिया है।हम ही है जो पूरे ब्रह्मांड में सदैव प्रसन्न रह सकते है,हम चिंतन कर सकते है,दूसरें जीवों के प्रति प्रेम, करुणा,दया और क्षमा का भाव रख सकते इस पृथ्वी को स्वर्ग बना सकते है।

वास्तव में प्रेम निष्ठा का प्रतीक है।आपके जीवन में प्रेम हो तो आज भी युवा वर्ग चमत्कार के फेर में न पड़ अपने पुरुषार्थ से पत्थर से भी पानी निकाल सकता है।

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