समलैंगिक विवाह मामले में सुरक्षित रखा फैसला

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सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने के आग्रह वाली याचिकाओं पर गुरुवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया.

मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने मामले में 10 दिन की सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. पीठ ने याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश ए.एम. सिंघवी, राजू रामचंद्रन, के. वी. विश्वनाथन, आनंद ग्रोवर और सौरभ कृपाल सहित वरिष्ठ अधिवक्ताओं की दलीलें सुनीं. सुनवाई के दौरान, केंद्र ने कहा कि संभव है कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर उसके द्वारा की गई कोई संवैधानिक घोषणा सही कार्रवाई नहीं हो क्योंकि अदालत इसके परिणाम का अनुमान लगाने, परिकल्पना करने, समझने और इससे निपटने में सक्षम नहीं होगी. केंद्र ने न्यायालय को बताया था कि उसे समलैंगिक विवाह के मुद्दे पर सात राज्यों से जवाब मिला है और राजस्थान, आंध्र प्रदेश. इनमें असम की सरकारों ने कानूनी मान्यता देने को लेकर याचिकाकर्ताओं की दलीलों का विरोध किया है.

पिछले कुछ समय में देशभर की कई अदालतों में याचिकाएं दायर करके समलैंगिक विवाह को वैधानिक मान्यता देने की मांग की जा रही है. 18 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने ऐसी 20 याचिकाओं को क्लब करके सुनवाई शुरू की. पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ में भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति रवींद्र भट, न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा शामिल हैं. शीर्ष अदालत के समक्ष याचिकाओं में विशेष विवाह अधिनियम, विदेशी विवाह अधिनियम और हिंदू विवाह अधिनियम सहित विभिन्न अधिनियमों के तहत समान-लिंग विवाह को मान्यता देने की मांग की गई है.

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