कांग्रेस पूरी ताकत से आक्रामक प्रचार में जुटी 

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मध्य प्रदेश में ‘इंडिया’ गठबंधन के घटकदल आमने-सामने हैं. सपा और आप के साथ जदयू भी चुनाव में अपने उम्मीदवार उतार चुका है. इसके बावजूद कांग्रेस पूरी ताकत के साथ आक्रामक प्रचार में जुटी है.

विधानसभा चुनाव के लिए आज नामांकन का आखिरी दिन है. प्रदेश की सभी 230 सीट के लिए 17 नवंबर को वोट डाले जाएंगे. ऐसे में पार्टी बिना कोई मौका गंवाए पूरी ताकत के साथ प्रचार कर रही है. पार्टी उन सीटों पर ज्यादा आक्रामक है, जिन क्षेत्रों से इंडिया गठबंधन के घटकदलों के उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं. ताकि, वोट का बंटवारा न हो.

चुनाव में छोटी पार्टियां हार-जीत में अहम भूमिका निभाती हैं. इन पार्टियों को बहुत सीट नहीं मिलती है, पर कई सीट पर वह हार-जीत के अंतर से ज्यादा वोट हासिल करती हैं, जिससे नतीजा बदल जाता है. वर्ष 2018 के चुनाव में 30 सीट पर कम अंतर से हार जीत हुई. इनमें से 15 सीट पर कांग्रेस और 14 पर भाजपा जीती. एक सीट बसपा को मिली.

दिलचस्प बात यह है कि जिन 14 सीट पर भाजपा की जीत हुई, उनमें से छह सीट पर छोटी पार्टियों को अंतर से ज्यादा वोट मिले थे. वहीं, कांग्रेस को मिली 15 में चार सीट पर छोटी पार्टियों ने अंतर से ज्यादा मत हासिल किए थे. वर्ष 2013 में 33 सीट पर ऐसी स्थिति बनी थी. इस साल भाजपा को 18, कांग्रेस को 12, बसपा को दो और निर्दलीय को एक सीट मिली थी.

यही वजह है कि मध्यप्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह लगातार कह रहे हैं कि मध्यप्रदेश में महज दो पार्टियां हैं. सरकार कांग्रेस या भाजपा की बनेगी. छोटी पार्टियों की सरकार नहीं बनने वाली है. इसलिए, वह मतदाताओं को छोटे दलों के झांसे में नहीं आने का आग्रह कर रहे हैं. ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर कांग्रेस ने सपा के साथ गठबंधन करने से क्यों परहेज किया.

समाजवादी पार्टी ने पिछले पांच चुनाव में 12 सीट पर जीत दर्ज की है. चंदला विधानसभा सीट को छोड़कर सपा किसी भी सीट पर एक बार जीतने के बाद दोबारा नहीं जीत पाई है. इन 12 सीट में से दो सीट अब अस्तित्व में नहीं है. ऐसे में प्रदेश की 230 में सिर्फ दस सीट ऐसी है, जिन पर समाजवादी पार्टी ने कभी न कभी जीत दर्ज की है.

प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि हम उन सीट पर खास ध्यान दे रहे हैं, जिन सीट पर कभी न कभी सपा ने जीत दर्ज की है. इन सीट पर आक्रामक प्रचार के साथ मतदाताओं को यह समझाने का प्रयास भी कर रहे हैं कि छोटी पार्टियों को वोट देने से कोई फायदा नहीं है. इसके साथ दूसरे प्रदेशों के नेताओं को चुनाव पर्यवेक्षक बनाया गया है. पार्टी नेता मानते हैं कि इस बार चुनाव में स्थिति अलग है.

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